Monday, 16 February 2015

बस एक उम्मीद ............

दहेज़ यह शब्द भले ही छोटा हो पर इसका दर्द उस माँ बाप से पूछो जिसने बेटी को जन्म दिया हो। भारतीय समाज की इस प्रथा को लोगो ने कुछ ऐसा बना दिया है, जिसके बोझ तले हर बेटी का परिवार दबा है। बहुत से लेखक ने बहुत कुछ लिखा हज़ारो संस्थाएं इस प्रथा को ख़त्म करने के लिए काम कर रही है। सरकार भी अपनी बेजोड़ प्रयास करती रहती है। पर सोचने वाली यह बात है की क्या समाज बदलेगा? क्या समाज मे दहेज प्रथा रुकी? लगता है, शायद इन सवालो का जवाब ना मेरे पास है, ना ही इस समाज के पास है।बेबस होकर बस हम देख रहे है, और इस प्रथा का बोझ ढो रहे है। सवाल सिर्फ समाज के उस ठेकेदारो से नहीं उन माँ बाप से भी है। जिन्हे अपनी बेटी बोझ लगती है। अपने बेटे को वही लोग अच्छी परवरिश देते है। घर मे ऐसे रखते है जैसे पैदा करके एहसान कर दिया हो। परिवार पर इस लिए की वह वंश बढ़एगा।


माँ बाप को मरने के बाद आग देगा? बस इस लिए लड़का घर का चिराग होता है और लड़की अभिशाप। बेटी जो पैदा होने के बाद अपने माँ बाप के लिए परेशानी होती है, घर मई वह ही होती है जो सारे काम करती है।शायद एक नौकरानी की तरह और दलील यह दी जाती है की अब नहीं सीखेगी तो कब सीखेगी तो शादी के बाद, क्या करेगी? शादी के बाद ऐसा लगता है बेटा बहू नहीं नौकरानी लाया है। बुढ़ापा आने के बाद अपने ही घर में अपने बेटे की नौकरानी बन जाती है। क्या यही जीवन है ? एक बेटा तमाम सवाल है, पर शायद इनका जवाब ना ही हमारे पास है और ना ही इस समाज के पास बस एक उम्मीद की किरण है।


" समाज बदलेगा और बेटी भी सर उठा के जी पायेगी "।

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