किसी जमीन पर एक भी पेड़ नहीं उगते, तो कही पत्थरों में जान आ जाती हैं।
कुछ लाशों को कफ़न नसीब नहीं होता , तो कुछ लाशों पर ताजमहल बन जाते हैं ।
जिंदगी बीत गयी फूटपाथ पर एक कपडा नसीब नहीं हुआ, मौत भी आई जिस घडी उस गरीब को तो कफ़न भी नसीब न हुआ ।उत्तर प्रदेश में रोज सैकड़ों लाशें ऐसी मिलती हैं जिनको पुलिस द्वारा अज्ञात का नाम दे कर फेक दिया जाता हैं। शाम को अख़बार में खबर लिखी जाती हैं और फिर उसे सुबह लोगो के नास्ते की प्लेट के साथ परोसा जाता हैं। लोग पढ़ते हैं खेद प्रकट करते हैं और फिर वही अपनी रोज मरा की जिंदगी में उलझ जाते हैं पर क्या कोई ऐसा भी हैं जो उनके बारे में सोचता हैं ।
हद तो तब हो जाती हैं जब पुलिस इन लाशों को ऐसे ही फेक देती हैं , तो सरकार के द्वारा दिया गया पैसा कहा जाता हैं । हर साल सरकार हर थाने को पैसे उप्लप्ध कराती हैं, एक विशेष् फण्ड के रूप में जिसमे ऐसी लावारिश लाशों को पुरे क्रिया करम से जलने के लिए पैसे दिए जाते हैं। पर वो पैसा कहा जाता हैं किसी को नहीं मालूम।
कई समाज सेवी संस्थान भी इस काम में लगी हैं पर फिर भी चोरी हो रही हैं। सरकार दावा करती हैं की हम पूरी तरह से काम कर रहे हैं पर क्या ये सच हैं....?
आज ही मैं जब कैसरबाग से निकली तो देखा की पिछले 3 घंटे से एक भिखारी की लाश पुलिस थाने के सामने पड़ी थी, पर न ही पुलिस और न ही आम लोग उसे देखने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस इसमें लगी थी की ये किस थाने के अंतर्गत आता हैं और जनता तो हमेशा से ही तमाशगीर रही हैं तो आज भी वही थी। ऐसे ही कुछ दिन पहले इंद्रानगर की एक घाटन दिल देहला देने वाली थी। सड़क किनारे रोटी बिलखती एक 6 साल की बच्ची अपनी मृतक माँ के लिए लोगो से कफ़न के लिए भीख मांग रही थी, लोग आ रहे थे तमाशा देख रहे थे और चले जा रहे थे पुलिस खड़े इस चीज़ में लगी थी की ये किस थाने के अंतर्गत आता हैं ।
हद तो तब हो जाती हैं जब इन लाशों को किसी हॉस्पिटल के मृत घर में महीनो रखा जाता हैं, और बाद में किसी नदी में फ़ेक दिया जाता हैं लावारिश का नाम देके । पुलिस द्वारा ऑफिसियल तोर पर पूरी कारवाही पूर्ण हो जाती हैं और सरकार द्वारा दिया गया पैसा पुलिस वालो की जेब में चला जाता हैं। लाशों को इस तरह नदियों में फेके जाने से जल में प्रदूषण फैलता हैं जो कही न कही आम लोगो की बीमारी का कारन बनता हैं क्योंकि किसी न किसी रूप में हम लोग उसी जल को पीते हैं और अपनी रोज मर की जिंदगी में इस्तमाल करते हैं।
बस मेरा इतना सा सवाल हैं क्या इन मृत शरीरों को एक कफ़न तक नसीब नहीं हो सकता जिन्दा रहते तो सरकारें इनके लिए कुछ नहीं कर पा रही, पर क्या मरने के बाद भी इन लोगो के शारीर को एक कफ़न नसीब नहीं हो सकता ।
बड़े अरमानो के साथ सजाया था सपना अपने जीवन का , पर बदनसीबी तो देखो मेरी एक कफ़न का टुकड़ा भी न नसीब हुआ इस जीवन में ।




