Sunday, 5 April 2015

गरीब का कीमती कफ़न



किसी जमीन पर एक भी पेड़ नहीं उगते, तो कही पत्थरों में जान आ जाती हैं।
कुछ लाशों को कफ़न नसीब नहीं होता , तो कुछ लाशों पर ताजमहल बन जाते हैं ।

जिंदगी बीत गयी फूटपाथ पर एक कपडा नसीब नहीं हुआ, मौत भी आई जिस घडी उस गरीब को तो कफ़न भी नसीब न हुआ ।उत्तर प्रदेश में रोज सैकड़ों लाशें ऐसी मिलती हैं जिनको पुलिस द्वारा अज्ञात का नाम दे कर फेक दिया जाता हैं। शाम को अख़बार में खबर लिखी जाती हैं और फिर उसे सुबह लोगो के नास्ते की प्लेट के साथ परोसा जाता हैं। लोग पढ़ते हैं खेद प्रकट करते हैं और फिर वही अपनी रोज मरा की जिंदगी में उलझ जाते हैं पर क्या कोई ऐसा भी हैं जो उनके बारे में सोचता हैं ।

हद तो तब हो जाती हैं जब पुलिस इन लाशों को ऐसे ही फेक देती हैं , तो सरकार के द्वारा दिया गया पैसा कहा जाता हैं । हर साल सरकार हर थाने को पैसे उप्लप्ध कराती हैं, एक विशेष् फण्ड के रूप में जिसमे ऐसी लावारिश लाशों को पुरे क्रिया करम से जलने के लिए पैसे दिए जाते हैं। पर वो पैसा कहा जाता हैं किसी को नहीं मालूम।
कई समाज सेवी संस्थान भी इस काम में लगी हैं पर फिर भी चोरी हो रही हैं। सरकार दावा करती हैं की हम पूरी तरह से काम कर रहे हैं पर क्या ये सच हैं....?

आज ही मैं जब कैसरबाग से निकली तो देखा की पिछले 3 घंटे से एक भिखारी की लाश पुलिस थाने के सामने पड़ी थी, पर न ही पुलिस और न ही आम लोग उसे देखने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस इसमें लगी थी की ये किस थाने के अंतर्गत आता हैं और जनता तो हमेशा से ही तमाशगीर रही हैं तो आज भी वही थी। ऐसे ही कुछ दिन पहले इंद्रानगर की एक घाटन दिल देहला देने वाली थी। सड़क किनारे रोटी बिलखती एक 6 साल की बच्ची अपनी मृतक माँ के लिए लोगो से कफ़न के लिए भीख मांग रही थी, लोग आ रहे थे तमाशा देख रहे थे और चले जा रहे थे पुलिस खड़े इस चीज़ में लगी थी की ये किस थाने के अंतर्गत आता हैं ।

 हद तो तब हो जाती हैं जब इन लाशों को किसी हॉस्पिटल के मृत घर में महीनो रखा जाता हैं, और बाद में किसी नदी में फ़ेक दिया जाता हैं लावारिश का नाम देके । पुलिस द्वारा ऑफिसियल तोर पर पूरी कारवाही पूर्ण हो जाती हैं और सरकार द्वारा दिया गया पैसा पुलिस वालो की जेब में चला जाता हैं। लाशों को इस तरह नदियों में फेके जाने से जल में प्रदूषण फैलता हैं जो कही न कही आम लोगो की बीमारी का कारन बनता हैं क्योंकि किसी न किसी रूप में हम लोग उसी जल को पीते हैं और अपनी रोज मर की जिंदगी में इस्तमाल करते हैं। 
बस मेरा इतना सा सवाल हैं क्या इन मृत शरीरों को एक कफ़न तक नसीब नहीं हो सकता जिन्दा रहते तो सरकारें इनके लिए कुछ नहीं कर पा रही, पर क्या मरने के बाद भी इन लोगो के शारीर को एक कफ़न नसीब नहीं हो सकता ।

बड़े अरमानो के साथ सजाया था सपना अपने जीवन का , पर बदनसीबी तो देखो मेरी एक कफ़न का टुकड़ा भी न नसीब हुआ इस जीवन में ।

Saturday, 7 March 2015

"आप एक्सपर्ट बन सकते हो पर परफेक्ट नही"



हर साल लखनऊ विश्वविद्यालय मे कई छात्र दाखिला लेते है। उन मे एक छात्र हमारे साथ है। अर्पित ओमर जो एक चैनल ETV NETWORK मे कॉपी एडिटर है और पोस्ट ग्रेजुएशन मास्स कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट से कर रहे है। एवम् कानपूर के रहने वाले हैं और देश को बदलने की चाह रखते हैं।

Arpit Omer 




कशिका - अर्पित अपने बारे में कुछ बताइये.....?

अर्पित -जैसा मेरा नाम है वैसे ही मेरा काम है , जैसा मैं दिखता हूँ वैसा ही मैं दूसरों के साथ पेश आता हूँ, मेरा नाम अर्पित हैं मैंने अपनी लाइफ को जिया हैं मेरी एक चीज़ हैं अगर मुझे कोई कुछ काम देता हैं तो उसको करने में मैं डिवोटेड हो जाता हूँ।

कशिका - आप हमेशा से लीडर बनना चाहते थे या लैक ऑफ़ लीडर शिप की वजह से आप आगे आते हो ?

अर्पित- मुझे लीडर बनने का कोई शोक नहीं हैं , मेरी पत्रकार यूनियन में ये बताया गया हैं की अकेले कुछ नहीं कर सकते अगर 5 ऊँगली में कोई ऊँगली अलग हो जाये तो वो कुछ नहीं कर सकती तो हम लोगो को टीम में काम करना चाहिए मेरा मानना हैं ज्ञान बाटने से बढ़ता हैं।


कशिका - आप इ टीवी में कॉपी एडिटर हैं तो जर्नीलिसम के लिए आप ने अपनी फैमिली को कैसे मनाया ?

अर्पित- मैं आप को बताना चाहता हूँ की मेरा फॅमिली बैकग्राउंड बिसिनेस बैकग्राउंड हैं , मेरी फैमिली ने आज तक कोई भी जॉब नहीं की , ना हि गवर्मेंट जॉब न ही प्राइवेट जॉब टोटली बिजनेस बैकग्राउंड हैं , पर मुझे इस बात का एहसास हुआ की क्यों ना कुछ बदलाव लाया जाये, मैं कुछ नया कदम उठाऊं अगर मैं भी उसी लाइन में चलता चला जाऊंगा तो आगे आने वाली पीढ़ी भी उसी राह में चलती जायेगी।

कशिका - इस जर्नी में आप की पर्सनॅलिटी को कैसे शेप किया ?

अर्पित- अभी तो जर्नी स्टार्ट हुई नहीं हैं अभी तो शुरवात हैं और अभी तो मेरी जॉब की स्टार्टिंग हैं अभी जर्नी हुई नहीं हैं, अभी तक जो कुछ हुआ हैं उसने मेरी पर्सनालिटी ने ग्रूम ही किया हैं । इस चीज़ ने मुझे काफी कुछ सीखने को मिल रहा हैं, सही गलत में अंतर पता चला और जो गलती हो रही हैं समाज में उसे हमे अपनी कलम से सुधारना पड़ेगा ।

कशिका - आप के माँ पाप क्या चाहते थे आप क्या बनो ?

अर्पित- जैसा की मैंने आप को बताया था वो येही चाहते थे की जल्द से जल्द बिज़नेस को संभाले और शादी कर के सेटल हो जाऊं पर मुझे कुछ बदलाव करना था, इसी वजह से मैंने ये फील्ड चुनी और मैं उस चीज़ को आगे बढ़ाऊंगा पर एक अलग तरीके से ।

कशिका - आप की सबसे बड़ी क्रिटिज़म क्या हैं ?

अर्पित-  आज आप को बताना चाहता हूँ की आज से 3 साल पहले मेरी आवाज़ बहुत पतली थी , बहुत से लोग कहते थे की आप की आवाज़ बिलकुल लड़कियों की तरह है , फिर मैंने बहुत मेहनत की रियाज़ किया बहुत सारे वोईस ओवर दिए और आज आप देख सकते हो मैंने अपने आप को बदल दिया ।

कशिका - आप खाली टाइम में क्या करना पसंद करते हैं ?

अर्पित - मुझे खाली टाइम में मैगज़ीन पढ़ना नोवल पढ़ना और टीवी में न्यूज़ चैनल देखना पसंद हैं ,आम लोगो की पसंद नार्मल होती हैं पर मैं थोडा हट के सोचता हूँ।


कशिका - आप के लिए समाज में सिर्फ जानकर होना चाहिए या एक अच्छा प्रेसेंट्रटर भी होना चाहिये क्योंकि छोटे शहरों के पत्रकार प्रेजेंटेशन पर ध्यान नहीं देते हैं ?

अर्पित -पत्रकार कोई छोटा या बड़ा नहीं होता हैं पत्रकार पत्रकार ही होता हैं , और वो समाज में बुराईओ को खत्म करने की और अच्छाइयों को समाज के सामने लाने की सोचता, और रही बात अगर वो जानकर हैं तो अपनी बात को सही मायने में प्रेसेंट करेगा।


कशिका - आज से 10 साल बाद आप अपने आप को किस पोज़िशन में देखना चाहोगे ?

अर्पित- मैं एक अच्छा इन्शान बनना चाहता हूँ आज की दुनिया में हर कोई भ्रष्टाचार में लिप्त हैं भले ही वो अमीर हैं पर वो अपने आप से सेटिशफाइड नहीं हैं , मेरा बस ये ऐम हैं की मैं एक अच्छा इन्शान बनू और 10 साल बाद जब मेरे पाप घर से निकले तो लोग कहे की देखो अर्पित के पाप जा रहे हैं ।

कशिका - इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ही क्यों चुना आप ने क्या आप टीवी को प्रिंट से बहेतर मानते हैं ?

अर्पित- जहाँ आज कल लोगो को 2 मीनट की फुरसत नहीं हैं तो मुझे लगता हैं हमे ज़माने के साथ कदम से कदम मिला के चलना चाहिए , प्रिंट में किसी भी खबर को विस्तार में बताया जाता हैं पर वही चीज़ इलेक्ट्रॉनिक में कम समय में बता दी जाती हैं।

कशिका - क्या आप को टीम में काम करना पसंद हैं या अकेले ?

अर्पित- मुझे टीम में काम करना पसंद हैं क्योंकि आप परफेक्ट नहीं हैं क्योंकि आप एक्सपर्ट बन सकते हो पर परफेक्ट नहीं, कही न कही आप से कोई गलती हो ही जायेगी ।

कशिका - आप को मॉस कॉम में कोई लड़की पसंद हैं ?

अर्पित - इस दुनिया में मुझे हर कोई पसंद हैं, और अभी मॉस कॉम में आये हुए मुझे 6 महीने हुऐ हैं सिर्फ और रही बात लड़कियों की तो मुझे जेसिका पसंद हैं निकी पसंद हैं कुसुम पसंद हैं सब लोग अच्छी हैं पर इसका मतलब ये नहीं की वो मुझे पसंद हैं तो वो मेरी ही हो जायेगी ।


कशिका- इंडिया में आप क्या नया चेंज देखना चाहते हैं या क्या बदलाव लाना चाहते हैं अपनी पत्रकारिता की वजह से ?

अर्पित- मैं लोगो की मानसिकता बदलना चाहता हूँ क्योंकि इंडिया के लोगो की मानसिकता बहुत सिमटी हुई हैं , वो अपने घरेलु जीवन से बाहर ही नहीं निकलना चाहते , वो लोग देश के प्रति सोचना ही नहीं चाहते , मैं यही कहूँगा की सबसे पहले लोग की मानसिकता को बदलना जरुरी हैं और विकास के पथ पर ले चले।

कशिका- आप को अपनी जिंदगी से क्या अक्सेप्टेशन हैं?

अर्पित- मैं अपनी जिंदगी से कोई अक्सेप्टेशन नहीं हैं मैं अपनी लाईफ से ये आशा रखता हूँ की जो मेरी इस देश के प्रति आशा हे वो मैं कर सकूँ।

कशिका- जी शुक्रिया और मेरी शुभकामयें आपके साथ है।

अर्पित- शुक्रिया कशिका।


Wednesday, 4 March 2015

बदलते युग के साथ बदलता स्टाइल

बदलते युग के साथ महिलाओं की स्टाइल और महिलाओं के पहनावे में बहुत तेजी से बदलाव आ रहा है । इस बदलते स्टाइल में सबसे ज्यादा असर महिलाओं की वेश भूषा में आ रहा है। एक वक़्त वो था जब महिलाएं अपना चेहरा भी घूघंट में छुपा के रखती थी , इस बदलाव में सबसे ज्यादा यौगदन फ़िल्म जगत का माना जाता है। जिस तेजी से आज की फिल्मो में नये नये स्टाइल्स के साथ अबिनेत्रियां आती है, उसको आज की आम महिलायें उसको अपनाने लगी हैं , पर सवाल ये भी है की क्या ये बदलता स्टाइल कही न कही महिलाओं के लिए परेशानी खड़ी कर रहा है.…? क्या यह बदलता स्टाइल समाज की नज़रों में महिलाओं को एक अलग दर्जा दे रहा है.…? सवाल ये भी है की क्या इस बदलते स्टाइल ने महिलाओं की इज्जत कम कर दी है।

जिस तरह कल्चर बदल रहा है जिस तरह परिवेश बदल रहा है, लोगो की सोच भी बदल रही है , जहाँ पहले लोग महिलाओं को घर की लक्ष्मी समझते थे वाही आज का युवा वर्ग उसी घर की लक्ष्मी को सिर्फ एक इस्तमाल की चीज़ समझ बैठा है ।

पर जिस तेजी से समाज में परिवर्तन आ रहा है उसे ये तो साफ़ है की आज की महिलाएं उस समाज के साथ कंधे से कन्धा मिला के चलना चाह रही है। जिसमे आज का बदलता आधुनिक फैसन उनकी खूबसूरती एवम् उनके विश्वास को भी बढ़ा रहा है , ऐसा कोई भी सेक्टर नहीं है जहाँ महिलाओं का पुरुष के बराबर यौगदन न हो। हर फील्ड में महिलाएं पुरषों की तुलना में आगे हैं पर क्यों ये समाज इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर रहा क्यों वो आज भी महिलाओं को अपना गुलाम रखना चाहता हैं।

इन सब का जवाब तो नहीं है बस उम्मीद हैं की आज का समाज पुरषों के साथ साथ महिलाओं को भी समझेगा और बदलते दौर में उनकी भी उतनी सहभागिता को अपनायेगा।


Monday, 16 February 2015

बस एक उम्मीद ............

दहेज़ यह शब्द भले ही छोटा हो पर इसका दर्द उस माँ बाप से पूछो जिसने बेटी को जन्म दिया हो। भारतीय समाज की इस प्रथा को लोगो ने कुछ ऐसा बना दिया है, जिसके बोझ तले हर बेटी का परिवार दबा है। बहुत से लेखक ने बहुत कुछ लिखा हज़ारो संस्थाएं इस प्रथा को ख़त्म करने के लिए काम कर रही है। सरकार भी अपनी बेजोड़ प्रयास करती रहती है। पर सोचने वाली यह बात है की क्या समाज बदलेगा? क्या समाज मे दहेज प्रथा रुकी? लगता है, शायद इन सवालो का जवाब ना मेरे पास है, ना ही इस समाज के पास है।बेबस होकर बस हम देख रहे है, और इस प्रथा का बोझ ढो रहे है। सवाल सिर्फ समाज के उस ठेकेदारो से नहीं उन माँ बाप से भी है। जिन्हे अपनी बेटी बोझ लगती है। अपने बेटे को वही लोग अच्छी परवरिश देते है। घर मे ऐसे रखते है जैसे पैदा करके एहसान कर दिया हो। परिवार पर इस लिए की वह वंश बढ़एगा।


माँ बाप को मरने के बाद आग देगा? बस इस लिए लड़का घर का चिराग होता है और लड़की अभिशाप। बेटी जो पैदा होने के बाद अपने माँ बाप के लिए परेशानी होती है, घर मई वह ही होती है जो सारे काम करती है।शायद एक नौकरानी की तरह और दलील यह दी जाती है की अब नहीं सीखेगी तो कब सीखेगी तो शादी के बाद, क्या करेगी? शादी के बाद ऐसा लगता है बेटा बहू नहीं नौकरानी लाया है। बुढ़ापा आने के बाद अपने ही घर में अपने बेटे की नौकरानी बन जाती है। क्या यही जीवन है ? एक बेटा तमाम सवाल है, पर शायद इनका जवाब ना ही हमारे पास है और ना ही इस समाज के पास बस एक उम्मीद की किरण है।


" समाज बदलेगा और बेटी भी सर उठा के जी पायेगी "।

Thursday, 12 February 2015

एक शिकायत मेरी भी

नवाबों का शहर लखनऊ नजाकत, नफासत का शहर लखनऊ जी वो लखनऊ जहाँ लोग खुली हवा में साँस लिया करते थे। जहा घोड़ों और बग्घियों में बैठ कर लखनऊ की शाम का मजा लेते थे, यहाँ लोगो के जीने का तरीका कुछ अलग है। बदलते परिवेश में अब इस शहर को ट्रैफिक की नजर लग गयी है। इस तेज़ चलती दुनिया की दौड़ में जहाँ हर इंसान अपना एक मिनट भी बर्बाद नहीं करना चाहता वही उसका पूरा वक़्त ट्रैफिक में ही निकल जाता हैं। हर किसी को शिकायत है साइकिल वाले को बड़ी गाड़ियों से शिकायत हैं, कार वालों को छोटी गाड़ियों से शिकायत हैं। इन गाड़ियों से रोड के किनारों में लगे ठेलों वालों को शिकायत हैं शिकायत शिकायत शिकायत हर किसी को किसी चलने वाले से शिकायत है ।

अब ये शिकायत हम आम इंसान की जिंदगी का एक हिसा सा बन गया है।  उस चीज़ का हल कैसे निकाला जाये ये न सोच कर घंटो लोग ट्रैफिक में खड़ा रेहना पसंद करते है। शायद यहाँ के लोगो के जीवन का एक हिसा बन चूका हैं ।अगर बात करे अपने लखनऊ की ट्रैफिक पुलिस की तो तुषार कपूर की मूवी गायब की याद आ जाती है। ट्रैफिक हवलदार रोड किनारे पान खाने में और गाड़ियां रोक के पैसे लेने में मस्त है। उनको इस बात की जरा सी फ़िक्र नहीं होती की चौराहे में लोग ट्रैफिक में फसे हैं और परेशान हो रहे हैं। अब तो माहौल ये आ चूका है की लखनऊ के कुछ चौराहों में पुलिस वाले नहीं पागल लोग ट्रैफिक को हाथ देते है।

 जहाँ वक़्त के साथ लोगो का जीवन तैज होता जा रहा है। हर इंसान अपना हर एक मिनट अपने काम को देना चाहता है ,और बचा समय अपने परिवार को देना चाहता है। परंतु वो उसे जादा वक़्त ट्रैफिक में व्यतीत करता है और आज का युवा वर्ग जिनको ट्रैफिक अपने घर में लगा वीडियो गेम जैसा दिखता है। वो लोग हर प्रयास करते हैं की कैसे निकलने और सामने वाले को चोट लगे या गिर जाये उनको सबसे आगे निकलना है, अगर नहीं पहुँचे तो गेम एन्ड हो जायेगा। बात ट्रैफिक पुलिस की करे तो लगता है, जैसे उनके लिए ये नोकरी सिर्फ धन उगाही का एक जरिया है। साल में एक महीना पुरे लखनऊ में ऐसे चेकिंग करेंगे ऐसी ट्रैफिक व्यवस्था करेंगे जैसे इनसे अच्छी व्यवस्था किसी की नहीं परंतु उसके बाद सिर्फ धन उगाही।

 जब इलेक्शन आते हैं तो नेताओं के बड़े बड़े वादे आते हैं ,परंतु जब नेताओं की सरकार बन जाती हैं तब उनके लिए ट्रैफिक रोका जाता हैं। क्या ये सही है ?अगर सच में सरकार जनता की इस शिकायत को दूर कर दे तो इसे अच्छी चीज़ आम इंसान के लिये कुछ भी नहीं हो सकती। अब तो बस उम्मीद है एक ऐसी उम्मीद जो शायद ही सच हो शायद ही लखनऊ फिर से खुली हवा में सास ले पायेगा।  लखनऊ का ट्रैफिक व्यवस्था कभी सुधरेगी लोग बेफिक्र हो कर चल पाएंगे हम फिर से अपना वही पुराना लखनऊ देख पाएंगे या नहीं पता नहीं बस इतना ही कहूँगी---

कुछ शिकायतें होती हैं छोटी सी ,
पर उनके अर्थ बड़े होते हैं।
मेरी भी शिकायत है छोटी सी ,
पर इस शिकायत से सब ही परेशान है।