नवाबों का शहर लखनऊ नजाकत, नफासत का शहर लखनऊ जी वो लखनऊ जहाँ लोग खुली हवा में साँस लिया करते थे। जहा घोड़ों और बग्घियों में बैठ कर लखनऊ की शाम का मजा लेते थे, यहाँ लोगो के जीने का तरीका कुछ अलग है। बदलते परिवेश में अब इस शहर को ट्रैफिक की नजर लग गयी है। इस तेज़ चलती दुनिया की दौड़ में जहाँ हर इंसान अपना एक मिनट भी बर्बाद नहीं करना चाहता वही उसका पूरा वक़्त ट्रैफिक में ही निकल जाता हैं। हर किसी को शिकायत है साइकिल वाले को बड़ी गाड़ियों से शिकायत हैं, कार वालों को छोटी गाड़ियों से शिकायत हैं। इन गाड़ियों से रोड के किनारों में लगे ठेलों वालों को शिकायत हैं शिकायत शिकायत शिकायत हर किसी को किसी चलने वाले से शिकायत है ।
अब ये शिकायत हम आम इंसान की जिंदगी का एक हिसा सा बन गया है। उस चीज़ का हल कैसे निकाला जाये ये न सोच कर घंटो लोग ट्रैफिक में खड़ा रेहना पसंद करते है। शायद यहाँ के लोगो के जीवन का एक हिसा बन चूका हैं ।अगर बात करे अपने लखनऊ की ट्रैफिक पुलिस की तो तुषार कपूर की मूवी गायब की याद आ जाती है। ट्रैफिक हवलदार रोड किनारे पान खाने में और गाड़ियां रोक के पैसे लेने में मस्त है। उनको इस बात की जरा सी फ़िक्र नहीं होती की चौराहे में लोग ट्रैफिक में फसे हैं और परेशान हो रहे हैं। अब तो माहौल ये आ चूका है की लखनऊ के कुछ चौराहों में पुलिस वाले नहीं पागल लोग ट्रैफिक को हाथ देते है।
जहाँ वक़्त के साथ लोगो का जीवन तैज होता जा रहा है। हर इंसान अपना हर एक मिनट अपने काम को देना चाहता है ,और बचा समय अपने परिवार को देना चाहता है। परंतु वो उसे जादा वक़्त ट्रैफिक में व्यतीत करता है और आज का युवा वर्ग जिनको ट्रैफिक अपने घर में लगा वीडियो गेम जैसा दिखता है। वो लोग हर प्रयास करते हैं की कैसे निकलने और सामने वाले को चोट लगे या गिर जाये उनको सबसे आगे निकलना है, अगर नहीं पहुँचे तो गेम एन्ड हो जायेगा। बात ट्रैफिक पुलिस की करे तो लगता है, जैसे उनके लिए ये नोकरी सिर्फ धन उगाही का एक जरिया है। साल में एक महीना पुरे लखनऊ में ऐसे चेकिंग करेंगे ऐसी ट्रैफिक व्यवस्था करेंगे जैसे इनसे अच्छी व्यवस्था किसी की नहीं परंतु उसके बाद सिर्फ धन उगाही।
जब इलेक्शन आते हैं तो नेताओं के बड़े बड़े वादे आते हैं ,परंतु जब नेताओं की सरकार बन जाती हैं तब उनके लिए ट्रैफिक रोका जाता हैं। क्या ये सही है ?अगर सच में सरकार जनता की इस शिकायत को दूर कर दे तो इसे अच्छी चीज़ आम इंसान के लिये कुछ भी नहीं हो सकती। अब तो बस उम्मीद है एक ऐसी उम्मीद जो शायद ही सच हो शायद ही लखनऊ फिर से खुली हवा में सास ले पायेगा। लखनऊ का ट्रैफिक व्यवस्था कभी सुधरेगी लोग बेफिक्र हो कर चल पाएंगे हम फिर से अपना वही पुराना लखनऊ देख पाएंगे या नहीं पता नहीं बस इतना ही कहूँगी---
कुछ शिकायतें होती हैं छोटी सी ,
पर उनके अर्थ बड़े होते हैं।
मेरी भी शिकायत है छोटी सी ,
पर इस शिकायत से सब ही परेशान है।
अब ये शिकायत हम आम इंसान की जिंदगी का एक हिसा सा बन गया है। उस चीज़ का हल कैसे निकाला जाये ये न सोच कर घंटो लोग ट्रैफिक में खड़ा रेहना पसंद करते है। शायद यहाँ के लोगो के जीवन का एक हिसा बन चूका हैं ।अगर बात करे अपने लखनऊ की ट्रैफिक पुलिस की तो तुषार कपूर की मूवी गायब की याद आ जाती है। ट्रैफिक हवलदार रोड किनारे पान खाने में और गाड़ियां रोक के पैसे लेने में मस्त है। उनको इस बात की जरा सी फ़िक्र नहीं होती की चौराहे में लोग ट्रैफिक में फसे हैं और परेशान हो रहे हैं। अब तो माहौल ये आ चूका है की लखनऊ के कुछ चौराहों में पुलिस वाले नहीं पागल लोग ट्रैफिक को हाथ देते है।
जहाँ वक़्त के साथ लोगो का जीवन तैज होता जा रहा है। हर इंसान अपना हर एक मिनट अपने काम को देना चाहता है ,और बचा समय अपने परिवार को देना चाहता है। परंतु वो उसे जादा वक़्त ट्रैफिक में व्यतीत करता है और आज का युवा वर्ग जिनको ट्रैफिक अपने घर में लगा वीडियो गेम जैसा दिखता है। वो लोग हर प्रयास करते हैं की कैसे निकलने और सामने वाले को चोट लगे या गिर जाये उनको सबसे आगे निकलना है, अगर नहीं पहुँचे तो गेम एन्ड हो जायेगा। बात ट्रैफिक पुलिस की करे तो लगता है, जैसे उनके लिए ये नोकरी सिर्फ धन उगाही का एक जरिया है। साल में एक महीना पुरे लखनऊ में ऐसे चेकिंग करेंगे ऐसी ट्रैफिक व्यवस्था करेंगे जैसे इनसे अच्छी व्यवस्था किसी की नहीं परंतु उसके बाद सिर्फ धन उगाही।
जब इलेक्शन आते हैं तो नेताओं के बड़े बड़े वादे आते हैं ,परंतु जब नेताओं की सरकार बन जाती हैं तब उनके लिए ट्रैफिक रोका जाता हैं। क्या ये सही है ?अगर सच में सरकार जनता की इस शिकायत को दूर कर दे तो इसे अच्छी चीज़ आम इंसान के लिये कुछ भी नहीं हो सकती। अब तो बस उम्मीद है एक ऐसी उम्मीद जो शायद ही सच हो शायद ही लखनऊ फिर से खुली हवा में सास ले पायेगा। लखनऊ का ट्रैफिक व्यवस्था कभी सुधरेगी लोग बेफिक्र हो कर चल पाएंगे हम फिर से अपना वही पुराना लखनऊ देख पाएंगे या नहीं पता नहीं बस इतना ही कहूँगी---
कुछ शिकायतें होती हैं छोटी सी ,
पर उनके अर्थ बड़े होते हैं।
मेरी भी शिकायत है छोटी सी ,
पर इस शिकायत से सब ही परेशान है।

Good job KASHIKA
ReplyDeleteजब तक लोग ट्रेफिक नियमों का पालन नहीं करेंगे तब तक जाम की समस्या बनी रहेगी ... यहाँ लोग सिस्टम को सही करना ही नहीं चाहते .. फिर चाहे चालान ही क्यों न कर दो . . . नियम बाद में बनता है यहाँ .. उसे तोड़ने वाले पहले आ जाते हैं ... इसके लिए सख्त कानून का होना बेहद जरुरी है ...
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